लेखिका : मधु धामा
तुर्क, पठान, पुर्तगाली, मुगलों और अंग्रेजों ने बार-बार भारत को लूटा और आतंक फैलाया और आज हम इतिहास की पुस्तकों में ऐसे कई लुटेरों को महान शासक के रूप से पढ़ते हैं, जो कि हिन्दुस्तान के साथ सरासर अन्याय है। देश में जब विलासी देशी शासक देश की सत्ता के काबिल नहीं रहे तो सत्ता पर विदेशी लुटेरों ने हक जमा दिया और उसके बाद तो आम जनता एकदम निराश ही हो गई। इसलिए आम जनता का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं रह गया था। देश और देशभक्ति की बजाय अब वे अपनी सुरक्षा पर ही ध्यान केंद्रित करते थे। कहने का अभिप्राय है कि दिल्ली के साथ सत्ता तो थी, पर जनता नहीं थी और जनता के पास सत्ता नहीं थी। इसलिए सत्ता और जनता में दूरी थी एकात्मकता नहीं थी, समरूपता नहीं थी। इतिहास के इस सच को लोगों ने उपेक्षित करते हुए हमें यह समझाने का प्रयास किया है कि हम परस्पर फूट से ग्रस्त थे और विदेशी हमारी पारस्परिक फूट का लाभ उठाने में सफल रहे।
प्रस्तुत पुस्तक में कुछ चुनींदा विदेशी या विदेशी मूल के बेरहम लुटेरों और क्रूर तानाशाहों के चरित्र को उजागर किया है।
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Hindi Sahitya Sadan
10/54, Desh Bandhu Gupta Rd, Central, Karol Bagh, New Delhi, Delhi, 110005
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